
मध्यप्रदेश में लंबे समय से चल रहे 27 प्रतिशत OBC आरक्षण विवाद ने अब निर्णायक मोड़ ले लिया है। जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्यपीठ में मंगलवार से इस बहुचर्चित मामले पर फाइनल हियरिंग शुरू हो गई। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच लगातार तीन दिनों तक इस मामले की सुनवाई करेगी। सुनवाई को लेकर प्रदेशभर से बड़ी संख्या में OBC उम्मीदवार हाईकोर्ट पहुंचे और उन्होंने राज्य सरकार से अदालत में मजबूती से पक्ष रखने की मांग की।
यह मामला खासतौर पर उन हजारों अभ्यर्थियों से जुड़ा है जिनकी सरकारी भर्तियां पिछले कई वर्षों से प्रभावित हैं। 27 प्रतिशत OBC आरक्षण लागू होने और उस पर कानूनी विवाद के कारण विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में 13 प्रतिशत पद होल्ड कर दिए गए थे, जिससे बड़ी संख्या में उम्मीदवार नियुक्ति से वंचित हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले को अंतिम रूप से सुनने के लिए विशेष सुनवाई तय की है। जानकारी के अनुसार 13, 14 और 15 मई को लगातार सुनवाई की जा रही है। अदालत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि अब मामले को लंबित नहीं रखा जाएगा और सभी संबंधित याचिकाओं पर समग्र सुनवाई की जाएगी।
दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार द्वारा OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने के बाद यह मामला न्यायालय पहुंचा था। विरोध पक्ष ने तर्क दिया कि इससे कुल आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो रही है, जबकि समर्थन पक्ष ने सामाजिक प्रतिनिधित्व और पिछड़े वर्गों के अधिकारों का मुद्दा उठाया।
इस पूरे विवाद के कारण प्रदेश में कई सरकारी विभागों की भर्तियां अटक गईं। खासतौर पर शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, मेडिकल और अन्य विभागों की नियुक्तियों में हजारों पद लंबे समय से रुके हुए हैं।
हाईकोर्ट पहुंचे कई उम्मीदवारों ने कहा कि वे पिछले कई वर्षों से नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि भर्ती परीक्षाएं और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद 13 प्रतिशत पद होल्ड होने से उन्हें नियुक्ति नहीं मिल पा रही है।
उम्मीदवारों ने महाधिवक्ता कार्यालय के सामने एकत्र होकर मांग की कि राज्य सरकार अदालत में मजबूती से OBC आरक्षण का पक्ष रखे ताकि जल्द से जल्द मामले का निराकरण हो सके।
प्रभावित अभ्यर्थियों का कहना है:
कुछ उम्मीदवारों ने यह भी कहा कि यदि जल्द फैसला नहीं आया तो हजारों युवाओं का भविष्य अधर में लटक सकता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पक्ष और विपक्ष में दायर याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणियों में सुनने का निर्णय लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस मामले में करीब 100 याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें लगभग 70 याचिकाएं आरक्षण के विरोध में और करीब 30 याचिकाएं समर्थन में दायर की गई हैं।
अदालत ने सुनवाई को व्यवस्थित करने के लिए दोनों पक्षों की दलीलों को अलग-अलग सुना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं है बल्कि राज्य की आरक्षण नीति और संवैधानिक व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
इस दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विशेष कानूनी टीम को अदालत में पेश किया गया है। सरकार की कोशिश है कि OBC आरक्षण को संवैधानिक और सामाजिक आधार पर सही ठहराया जा सके।
राज्य सरकार पहले ही हाईकोर्ट में यह स्पष्ट कर चुकी है कि OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से लिया गया था। सरकार का तर्क है that पिछड़े वर्गों को पर्याप्त अवसर देने के लिए यह निर्णय आवश्यक था।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि:
महाधिवक्ता कार्यालय के बाहर पहुंचे उम्मीदवारों ने भी सरकार से अपेक्षा जताई कि वह अदालत में मजबूती से अपना पक्ष रखे और जल्द समाधान सुनिश्चित करे।
27 प्रतिशत OBC आरक्षण मामला अब केवल कानूनी विवाद नहीं बल्कि प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और रोजगार व्यवस्था से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला आने वाले समय में हजारों सरकारी पदों पर भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करेगा।
कानूनी जानकारों के अनुसार इस मामले के प्रमुख प्रभाव निम्न हो सकते हैं:
वहीं, प्रभावित उम्मीदवारों का कहना है कि अदालत से जल्द निर्णय आने पर हजारों युवाओं को राहत मिल सकती है।
मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण का मामला अब निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। जबलपुर हाईकोर्ट में शुरू हुई अंतिम सुनवाई पर लाखों उम्मीदवारों और पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं। लंबे समय से लंबित भर्ती प्रक्रियाओं और 13 प्रतिशत होल्ड पदों के कारण प्रभावित युवाओं को उम्मीद है कि अदालत का फैसला उनके भविष्य को नई दिशा देगा।
अब देखना होगा कि तीन दिनों तक चलने वाली इस अहम सुनवाई के बाद हाईकोर्ट क्या फैसला देता है और क्या वर्षों से अटकी सरकारी भर्तियों का रास्ता साफ हो पाता है या नहीं।
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