
Last updated: June 18th, 2026 at 04:55 pm
मध्यप्रदेश की राजनीति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में जबलपुर स्थित हाई कोर्ट में कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई है। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब आने वाले दिनों में इस मामले में निर्णय सुनाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
यह याचिका नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा दायर की गई है, जिसमें निर्मला सप्रे की विधायकी को शून्य घोषित करने की मांग की गई है।
यह मामला दलबदल कानून से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप है कि कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह कृत्य संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) का उल्लंघन है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि विधायक के इस कदम से लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंची है और इसलिए उनकी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए।
हाई कोर्ट में इस मामले पर विस्तृत सुनवाई हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क पेश किए। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निर्मला सप्रे का आचरण स्पष्ट रूप से दलबदल की श्रेणी में आता है और इस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
वहीं, विधायक पक्ष की ओर से इस आरोप को खारिज करते हुए कहा गया कि उन्होंने किसी भी प्रकार से दलबदल कानून का उल्लंघन नहीं किया है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रेरित हैं।
सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि हाई कोर्ट का फैसला किस दिशा में जाएगा। यदि अदालत याचिका को सही ठहराती है, तो निर्मला सप्रे की विधायकी पर खतरा मंडरा सकता है और उनकी सदस्यता शून्य घोषित की जा सकती है।
वहीं, यदि अदालत विधायक के पक्ष में फैसला देती है, तो उन्हें राहत मिल सकती है और उनकी सदस्यता बरकरार रहेगी।
यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मध्यप्रदेश की राजनीति में पहले ही दलबदल के मुद्दे संवेदनशील रहे हैं और इस फैसले का असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने से यह भी स्पष्ट है कि विपक्ष इस मामले को गंभीरता से ले रहा है और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
भारत में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत लागू होता है। इसके अनुसार, यदि कोई विधायक अपनी पार्टी के निर्देशों के खिलाफ जाकर कार्य करता है या स्वेच्छा से पार्टी छोड़ देता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
हालांकि, इस कानून की व्याख्या कई मामलों में जटिल हो जाती है, और अंतिम निर्णय अक्सर अदालत या विधानसभा अध्यक्ष के स्तर पर होता है।
फिलहाल हाई कोर्ट द्वारा फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद अब सभी की नजर आने वाले दिनों में सुनाए जाने वाले निर्णय पर टिकी हुई है। यह फैसला न केवल निर्मला सप्रे के राजनीतिक भविष्य को तय करेगा, बल्कि राज्य की राजनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
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