
Last updated: October 21st, 2026 at 05:02 pm
जबलपुर। मां दुर्गा की विदाई से पहले जबलपुर के बंगाली क्लब सिद्धि बालापुर लाइब्रेरी में वर्षों पुरानी सिंदूर खेला की परंपरा निभाई गई। बंगाली समुदाय की महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना की।
बताया जाता है कि बंगाली क्लब में यह परंपरा लगातार 101 वर्षों से निभाई जा रही है। हर वर्ष विजयादशमी के अवसर पर होने वाला यह आयोजन बंगाली समुदाय की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
सिंदूर खेला के दौरान बंगाली समुदाय की महिलाएं पारंपरिक लाल किनारी वाली साड़ी पहनकर शामिल हुईं। महिलाओं ने सबसे पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया।
इसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे के माथे और मांग में सिंदूर लगाया। इस दौरान मां दुर्गा से अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की गई।
सिंदूर खेला से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा को अर्पित किया गया सिंदूर शुभ और मंगलकारी माना जाता है। महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद उसे अपने माथे पर धारण करती हैं।
इस परंपरा के माध्यम से महिलाएं मां दुर्गा से अपने परिवार की सुख-शांति और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना करती हैं। आयोजन के दौरान महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
सिंदूर खेला के दौरान धार्मिक आस्था के साथ बंगाली संस्कृति की भी खूबसूरत झलक देखने को मिली। सिंदूर अर्पण के बाद महिलाओं ने पारंपरिक बंगाली नृत्य किया।
पूरे आयोजन में पारंपरिक परिधान, नृत्य और धार्मिक रीति-रिवाजों ने माहौल को उत्सवमय बना दिया। इस दौरान बड़ी संख्या में समुदाय के लोग मौजूद रहे।
सिंदूर खेला की रस्म पूरी होने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को विदाई दी गई। इसके बाद प्रतिमा को विसर्जन के लिए जबलपुर के ग्वारीघाट स्थित नर्मदा तट ले जाया गया।
मां दुर्गा की विदाई के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ उन्हें अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण दिया।
बंगाली क्लब में एक सदी से अधिक समय से चली आ रही सिंदूर खेला की परंपरा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि बंगाली समुदाय की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है।
101 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा जबलपुर में बंगाली समुदाय की धार्मिक आस्था, सामाजिक एकजुटता और मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा को दर्शाती है। हर वर्ष नई पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ती है, जिससे इसकी सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ रही है।
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