
Last updated: July 3rd, 2026 at 12:06 pm
जबलपुर, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सिवनी मालवा की महिला न्यायाधीश को सोशल मीडिया पर मिल रही कथित धमकियों और आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लिया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार से इस पूरे मामले में विस्तृत जवाब तलब किया है और पूछा है कि न्यायाधीश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने की। अदालत ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को शपथपत्र (हलफनामा) के माध्यम से विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
पूरा मामला सिवनी मालवा में पदस्थ न्यायाधीश तबस्सुम खान से जुड़ा है। उन्होंने 12 जून 2026 को गौहत्या से संबंधित एक मामले में 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अदालती फैसले के बाद सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर न्यायाधीश के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियां और धमकी भरे संदेश प्रसारित होने लगे। इस घटनाक्रम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय मानते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि महिला न्यायाधीश की सुरक्षा के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत ने इस संबंध में अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और डीजीपी को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और इस मामले में उठाए गए सभी कदमों की विस्तृत जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि न्यायाधीश तबस्सुम खान की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
सरकार की ओर से बताया गया कि उन्हें 1-5 श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित आपत्तिजनक पोस्ट को हटाने की प्रक्रिया भी संबंधित एजेंसियों के माध्यम से शुरू कर दी गई है।
अदालत के समक्ष यह जानकारी भी दी गई कि सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री की निगरानी की जा रही है। संबंधित प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कथित आपत्तिजनक पोस्ट को हटाने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई के लिए प्रक्रिया जारी है।
हालांकि, इन पोस्टों को लेकर अंतिम कार्रवाई जांच और संबंधित एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर की जाएगी।
इस मामले को केवल एक न्यायाधीश की सुरक्षा तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है। हाईकोर्ट का यह कदम इस बात का संकेत है कि न्यायिक कार्यों के कारण किसी भी न्यायाधीश को धमकी या दबाव का सामना करना पड़े, तो ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाएगा।
फिलहाल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अगली सुनवाई में सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे और सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
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