होमट्रेंडिंगपद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: जबलपुर से रहा गहरा जुड़ाव, कई मंचों से बिखेरी लोककला की अलख

पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: जबलपुर से रहा गहरा जुड़ाव, कई मंचों से बिखेरी लोककला की अलख

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देश की प्रख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई के निधन से कला और संस्कृति जगत
Padma Vibhushan Teejan Bai का निधन, Jabalpur से था खास जुड़ाव

देश की प्रख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई के निधन से कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर है। महाभारत की कथाओं को अपनी ओजस्वी आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली से जीवंत करने वाली तीजन बाई का मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से भी गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने कई अवसरों पर शहर में अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया और लोककला के प्रति नई पीढ़ी में रुचि जगाई।

उनके निधन की खबर के बाद जबलपुर के साहित्यकारों, रंगकर्मियों और कला प्रेमियों ने इसे भारतीय लोककला के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।

जबलपुर के सांस्कृतिक मंचों पर छोड़ी अमिट छाप

डॉ. तीजन बाई ने अपने लंबे कलात्मक जीवन में कई बार जबलपुर आकर पंडवानी की प्रस्तुति दी। उनकी दमदार आवाज और मंच संचालन की शैली ने हर बार दर्शकों को बांधे रखा।

जबलपुर के सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र होती थी। उनकी प्रस्तुतियों के माध्यम से शहर के लोगों को भारतीय लोक परंपरा और महाभारत की कथाओं को एक अलग अंदाज में देखने और सुनने का अवसर मिला।

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने किया था सम्मानित

साल 2003 में तत्कालीन रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (वर्तमान रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय) ने डॉ. तीजन बाई को मानद डी.लिट. (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की उपाधि से सम्मानित किया था। यह सम्मान उन्हें भारतीय लोककला और पंडवानी परंपरा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में उनके असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया गया था।

यह सम्मान जबलपुर और तीजन बाई के बीच सांस्कृतिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाली महान कलाकार

डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी की पारंपरिक शैली को नई दिशा दी। उन्होंने उस समय कापालिक शैली में मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देने की परंपरा को लोकप्रिय बनाया, जब इसे मुख्य रूप से पुरुष कलाकारों की शैली माना जाता था।

उनकी सशक्त आवाज, भावपूर्ण अभिनय और संवाद शैली ने पंडवानी को देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई मंचों तक पहुंचाया। उनके प्रयासों से छत्तीसगढ़ की लोककला को वैश्विक पहचान मिली।

पद्म श्री से पद्म विभूषण तक का प्रेरणादायक सफर

भारतीय लोककला में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और बाद में पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया।

उनकी उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत सम्मान तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने भारतीय लोक संस्कृति को विश्व मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

जबलपुर के कला जगत में शोक की लहर

डॉ. तीजन बाई के निधन पर जबलपुर के साहित्यकारों, कलाकारों और रंगकर्मियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उनका कहना है कि तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की सशक्त पहचान थीं।

कला जगत का मानना है कि उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुति शैली और लोककला के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

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