
Last updated: May 21st, 2026 at 04:30 pm
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने निजी मंदिरों के प्रबंधन को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि सरकार निजी मंदिरों के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति दीपक कुमार खाते की एकलपीठ ने यह आदेश सिवनी जिले के डूंडा सिवनी गांव स्थित एक शिव मंदिर से जुड़े मामले में दिया। कोर्ट के इस फैसले को प्रदेशभर के निजी मंदिरों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला सिवनी जिले के डूंडा सिवनी गांव के शिव मंदिर से जुड़ा है। याचिकाकर्ता सुमरन ने लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा बनाई गई 5 सदस्यीय समिति को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिका में दावा किया गया कि मंदिर का निर्माण वर्ष 1913 में स्वर्गीय भवानी पटेल ने कराया था। पिछले चार पीढ़ियों से परिवार ही मंदिर की देखरेख कर रहा है।
साथ ही मंदिर के रखरखाव और पूजा-पाठ के लिए करीब 14 एकड़ जमीन भी छोड़ी गई थी।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि निजी मंदिरों में सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर की संपत्ति देवता के नाम पर दर्ज होना जरूरी है, क्योंकि कानून में देवता को “विधिक इकाई” माना जाता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुजारी केवल पूजा-पाठ और संपत्ति की देखरेख करता है।
मंदिर की संपत्ति का वास्तविक स्वामी मंदिर में स्थापित देवता ही होते हैं।
यह टिप्पणी भविष्य में मंदिर संपत्ति विवादों में भी अहम मानी जा रही है।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले “स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति” का भी हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि सभी मंदिरों का प्रबंधन कलेक्टर के अधीन नहीं माना जा सकता। केवल सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में ही प्रशासन की भूमिका तय होती है।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी निजी मंदिर या उसकी संपत्ति का दुरुपयोग होता है, तो कोई भी श्रद्धालु या संबंधित व्यक्ति “नेक्स्ट फ्रेंड” बनकर अदालत में मुकदमा दायर कर सकता है।
इस टिप्पणी को मंदिर संपत्तियों की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप सभी जिला कलेक्टरों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
इसके अलावा संबंधित प्राधिकारी को तीन महीने के भीतर जांच कर यह तय करने के निर्देश दिए गए हैं कि संबंधित मंदिर निजी है या सार्वजनिक।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद धार्मिक संस्थाओं, मंदिर समितियों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला निजी मंदिरों के अधिकार और प्रशासनिक सीमाओं को लेकर भविष्य में बड़ा संदर्भ बन सकता है।
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