
Last updated: October 10th, 2026 at 10:27 am
मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की केन-बेतवा लिंक परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में पन्ना टाइगर रिजर्व, केन घड़ियाल अभयारण्य, वन क्षेत्र और प्रभावित समुदायों से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं।
चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार से केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की रिपोर्ट तथा उससे संबंधित कार्यवाही की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को होगी।
जबलपुर के अधिवक्ता अरिहंत तिवारी की ओर से दायर जनहित याचिका में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के जलभराव से पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है और करीब 60 लाख पेड़ों की कटाई की आवश्यकता पड़ सकती है।
याचिका में बाघ, तेंदुए, गिद्ध समेत अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके आवागमन के रास्तों पर संभावित प्रभाव की आशंका जताई गई है। ये आंकड़े और प्रभाव संबंधी दावे याचिका में लगाए गए हैं, जिन्हें अदालत ने अभी अंतिम रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया है।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी CEC की रिपोर्ट से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर जानकारी मांगी है। कोर्ट के सामने मुख्य रूप से यह स्पष्ट करने का मुद्दा है कि रिपोर्ट में परियोजना को लेकर क्या टिप्पणियां या कथित अनियमितताएं सामने आई हैं और संबंधित मामलों में अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट में केन-बेतवा परियोजना से संबंधित कार्यवाही की वर्तमान स्थिति और CEC रिपोर्ट के आधार पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी भी मांगी है।
याचिका में परियोजना के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में स्थित केन घड़ियाल अभयारण्य पर संभावित प्रभाव का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस क्षेत्र पर परियोजना के प्रभाव का स्वतंत्र और वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जाना चाहिए।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, CEC ने पहले भी केन-बेतवा परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव से जुड़े कुछ मुद्दे उठाए थे। केंद्र सरकार ने 2022 में संसद में बताया था कि CEC ने 2019 में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और उसकी चिंताओं पर परियोजना से जुड़ी एजेंसी की ओर से जवाब दिया गया था।
जनहित याचिका में वर्ष 2017 की पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी EIA रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट में कथित तथ्यात्मक त्रुटियों और परियोजना के जलविज्ञान से जुड़े स्वतंत्र अध्ययन की आवश्यकता का मुद्दा उठाया है।
हालांकि, केंद्र सरकार के 2022 के संसदीय जवाब के अनुसार परियोजना से जुड़े हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की द्वारा किए गए थे और उनका केंद्रीय जल आयोग द्वारा परीक्षण किया गया था।
याचिका में परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों, आदिवासी और किसान समुदायों से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने छतरपुर जिले में परियोजना के विरोध में हुए आंदोलनों और प्रदर्शनकारियों पर कथित प्रशासनिक दबाव के आरोप लगाए हैं।
इनमें राशन-पानी की आपूर्ति और ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित किए जाने जैसे दावे भी शामिल हैं। इन आरोपों पर हाईकोर्ट की ओर से अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा नदी बेसिन की ओर ले जाना है। परियोजना को बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की सुविधा बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण नदी जोड़ो परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
केंद्र सरकार ने 8 दिसंबर 2021 को परियोजना के वित्त पोषण और क्रियान्वयन को मंजूरी दी थी। सरकार के अनुसार, परियोजना से मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के कई जिलों को सिंचाई और पेयजल सुविधाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है।
वहीं, जनहित याचिका में परियोजना के संभावित लाभों के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभावों और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले असर का व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन किए जाने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट की ताजा कार्यवाही में परियोजना पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया गया है। अदालत ने संबंधित रिपोर्ट और कार्यवाही की स्थिति स्पष्ट करने के लिए जानकारी मांगी है।
अब 13 अक्टूबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र और राज्य की ओर से CEC रिपोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही तथा रिपोर्ट के आधार पर उठाए गए कदमों से संबंधित स्थिति सामने रखी जाएगी।
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